मंगलवार, 14 जुलाई 2020

भारत चीन नेपाल सम्बंध

भारत चीन नेपाल सम्बंध 

यदि नेपाल और चीन तथा नेपाल और भारत, दोनों के संपर्को को देखा जाये तो हम पाएंगे कि नेपाल और भारत के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक और नृवंशविज्ञान की अदभुत समानताएं है, जो कि चीन और नेपाल के मध्य नहीं है। अतः भारत को सांस्कृतिक कूटनीति पर मुख्य बल देना चाहिए, इसके अतिरिक्त अन्य समानताओं यथा आयुर्वेद और योग पर भी ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

२ नेपाल और भारत को भाषा केन्द्रों की स्थापना करनी चाहिए जहाँ नेपाल की प्राचीन और आधुनिक भाषाओँ का विकास किया जा सके, यह भाषा कूटनीति का एक आयाम हो सकता है। सिक्किम और बंगाल के पहाड़ी इलाकों में लोगों की मात्रभाषा नेपाली है, इन भागों में भाषा केंद्र स्थापित करने से दोनों देशों में प्रगाढ़ता आ सकती है।
नेपाल और भारत के संबंध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दोनों लिहाज से बेहद मजबूत हैं। भारत को नेपाल अपना बड़ा भाई मानता है । भारत ने नेपाल की हर क्षेत्र में मदद की है और नेपाल भी भारत के साथ अपने रिश्तों को प्राथमिकता देता है। लेकिन हाल के दिनों में चीन की नजर इस रिश्ते पर है और नेपाल के साथ वो लगातार नजदीकियां बढ़ा रहा है।
चीन ने एक बार फिर नेपाल के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने वाला कदम उठाया है जिससे भारत की चिंताएं फिर बढ़ गई हैं। चीन ने शुक्रवार को नेपाल को व्यापार के लिए अपने चार बंदरगाह व तीन लैंडपोर्ट का उपयोग करने की अनुमति दे दी। बंदरगाह विहीन देश नेपाल की भारत पर निर्भरता को कम करने के लिए तीसरे देश के तौर पर उभरने को चीन की यह चाल मानी जा रही है।
नेपाल ने चीन की 'वन बेल्ट वन रोड' परियोजना पर दस्तख़्त किए हैं,जिससे चीन के साथ नजदीकी बढ़ जायेगी। नेपाल ने भारत के आर्थिक नाकेबंदी के वक़्त चीन का रुख किया और उस कठिन परिस्थिति में उसे समर्थन का विश्वास मिल गया। चीन नेपाल के साथ रेल संपर्क को तिब्बत से लेकर लुंबिनी तक ले जाना चाहता है।

लेकिन नेपाल के भारत के साथ संबंध का आयाम चीन के साथ संबंध से अलग है ये भूगौलिक नजदीकी के साथ सांसकृतिक समानता को भी लिये हुए है । लेकिन जिस तरह से चीन एशिया पर अपना प्रभुत्व बढ़ाने के लिए और भारत पर दबाव बनाने के लिए पाकिस्तान,बांग्लादेश और श्रीलंका को मदद दे रहा है वो आने वाले समय में भारत की मुश्किलें बढ़ा रहा है !
भारत और चीन के बीच आपसी मुद्दों को निबटाने के लिए अगर कोई भी रास्ता खुलता है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।'अनौपचारिक शिखर सम्मेलन' ने दोनों देशों के बीच तापमान को नीचे लाकर अपना उद्देश्य पूरा किया।लेकिन आगे क्या ....भारत को भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता को नष्ट नहीं देना चाहिए ..... हमें किसी पर निर्भर नहीं होना चाहिए
डॉ अलका पाण्डेय मुम्बई

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