रविवार, 12 जुलाई 2020

मेरा गाँव मेरी पहचान

मेरा गाँव मेरी पहचान

         जहाँ मिले ताजा हवा,और पेड़ की छाँव।
         प्रेम जहाँ हर दिल रहे,ऐसा मेरा गाँव।।

  गाँव इस शब्द को सुनते ही गाँव से दूर रह रहे लोगों के हृदय से होकर नेत्रों में अपने गाँव का दृश्य झलक जाता है। गाँव से जुड़ी प्रत्येंक याद वास्तविकता बन कर सामने आ जाती है। 
 आज मैं अपने गाँव के विषय में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य आप सभी के समक्ष रखती हूँ। जैसे कि मेरे गाँव की स्थापना और नामकरण कैसे हुआ? इसमें स्थापित शिवमन्दिर का निर्माण कैसे हुआ? और मेरे गाँव पर सिद्धपुरुष भगवान भोलेनाथ की कैसे और क्या क्या कृपा हुयी है?

  मुगल काल में जब बादशाह औरंगजेब ने बलपूर्वक हिन्दुओं को मुस्लमान बनाने का अभियान चलाया, तब मेरठ जिले के गाँव राछौती के पास बंजर भूमि पर अपना पड़ाव (डेरा) डाला था। अभियान के बाद उक्त स्थान को "डेरा" के नाम से जाना जाने लगा था।

  मेरठ जिले के गंगनहर के पास एक गाँव डूंगर से पंडित पदार्थ अपने यजमान के साथ लगभग ३०० वर्ष पूर्व इस स्थान पर आकर बस गए थे। कालांतर में इस बस्ती को "डेरी" नाम दिया गया था।
   

   शैले शैले न माणिक्यं मोक्तिकम् न गजे, 
   गजे साधुओं ने सर्वत्र चंदन न वने वने।।

अर्थात् सभी पर्वत हीरो से सम्पन्न नहीं होते, और न ही सभी हाथी हस्तमुक्ता से सम्पन्न होते हैं, सभी साधु गण सर्वज्ञ नहीं होते और न प्रत्येक वन में चन्दन के वृक्ष होते हैं।

 दैवयोग से मेरे गाँव में एक सर्वज्ञ साधू का प्राकट्य हुआ जिनकी कृपाओं से लाभान्वित होकर बस्ती वालो ने उन्हें भगवान माना। उन्होंने अपना सम्बोधन भोलेनाथ के नाम से बताया। बताते हैं कि बाबा भोलेनाथ अत्यन्त उदार स्वभाव वाले महापुरुष थे। भगवान भोलेनाथ बच्चों के प्रति बहुत स्नेह रखते थे।
 
  एक दिवस बाबा भोलेनाथ बस्ती भ्रमण के लिए जा रहे थे। तभी एक महिला अपनी मृत बालिका को लेकर बाबा के सम्मुख आयी और फुट फुट कर रोने लगी। महिला बोली " बाबा मेरी पुत्री मृत हो गयी है आप कुछ कृपा कीजिए"।
महिला को विलाप करते देख बाबा भोले नाथ ने बालिका के सिर पर हाथ फेरा और बालिका जीवित हो उठी। इस घटना को बस्ती वासियों ने बाबा की प्रथम कृपा माना और उनकी श्रद्धा बाबा भोलेनाथ के लिए बढ़ गयी। 

  बाबा भोलेनाथ की ख्याति दूर दूर तक होने लगी। उसी समय मीरापुर का एक सेठ जोकि कुष्ठ रोग से पीड़ित था। भगवान भोले नाथ के पास आकर उनके चरणों में गिर गया और गिड़गिड़ाने लगा कि "भगवान मैं कुष्ठ रोग से पीड़ित हूँ और विदेशो में भी अपना उपचार करवा चुका हूँ, परन्तु अभी तक सफलता प्राप्त नहीं हुयी है, इसलिए आपकी शरण में आया हूँ, मुझ शरणार्थी पर दया करो भगवान"। 
  भगवान भोलेनाथ ने सेठ के सिर पर अपना वरद हस्त रखा तो उसे कुष्ठ रोग में परिवर्तन महसूस हुआ और अति शीघ्र ही उसे कुष्ठ रोग से मुक्ति मिली। वह सेठ अपनी कुष्ठ काया को स्वर्णिम काया देखकर अति प्रसन्न हुआ और भगवान भोलेनाथ के इस उपकार की भूरी-भूरी प्रंशसा करने लगा।
  उसने भगवान भोलेनाथ से करबद्ध प्रार्थना की कि
"भगवन कुछ मांगिये आपको कुछ देना मेरा अहो भाग्य होगा"।
  यह सुनकर भगवान भोलेनाथ ने कहा कि " वत्स मुझे किसी वस्तु या धन की कोई आवश्यकता नहीं है मैं तो प्रत्येक स्थिति में प्रसन्न रहने वाला हूँ"। 

  सेठ के अधिक अनुन्य विनय करने पर भगवान भोलेनाथ ने कहा यदि तुम मुझे कुछ देना ही चाहते हो तो इस बस्ती में कोई मंदिर नहीं है, इसलिए इसमें एक शिवमन्दिर का निर्माण, एक पक्का कुआं तथा पुजारी के रहने के लिए एक कुटी का निर्माण करा दीजिये। यह सुनकर सेठ हर्षित मन से अपने घर गया तथा बैल पर चाँदी के रुपए लादकर( उस समय चाँदी के रुपए प्रचलन में थे) भगवान भोलेनाथ के पास आया और कहने लगा कि "आप अपनी इच्छा अनुसार मंदिर का निर्माण करायें, और मुझे इस धन को रखने के लिए स्थान बतायें"।
भगवान भोलेनाथ ने कहा मेरे पास कोई तिजोरी तो है नहीं, जो मैं इस धन को वहां रखुवाऊं मेरा जो धूना है उस धूने में ये सारा धन डाल दीजिये। सेठ ने वह धन धूने में डाल कर उसे राख से ढक दिया।

  भगवान भोलेनाथ ने मजदूरों को बुलाकर मंदिर निर्माण के लिए ईंटे पथवाने का कार्य शुरू किया तथा उन्हें पकवाकर मंदिर निर्माण का कार्य आरंभ हो गया तथा कुछ समय में एक भव्य शिव मंदिर का निर्माण हुआ। जिसमें पंचमुखी शिवलिंग सहित शिव परिवार की मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा करवाकर उन्हें स्थापित करवाया गया। शिवमन्दिर  के सामने एक पक्का कुआं और दक्षिण में पुजारी के लिए एक पक्की कुटी का निर्माण हुआ।

  जनश्रुति के अनुसार बताया जाता है कि भगवान भोलेनाथ मजदूरों को संध्या के समय मजदूरी अपने धूने से निकाल कर देते थे। एक दिन संध्या के समय उन्होंने दो मजदूरों को दौगुनी मजदूरी दी, दूसरे मजदूर यह देखकर कहने लगे कि बाबा आपने इन्हे दौगुनी मजदूरी क्यों दी है?
  भोलेनाथ बाबा कहने लगे "इन दोनों ने पूरी रात्रि मेरे धूने में धन को खोजा है, परन्तु इन्हे कुछ प्राप्त नहीं हुआ। इन्होंने दिन और रात्रि दोनों में काम किया है, इसलिए इन्हे दौगुनी मजदूरी दी है"।
ऐसा सुनकर चोर मजदूर बहुत शर्मिंदा हुए और भगवान  भोलेनाथ के चरणों में लेटकर क्षमा याचना करने लगे।

  एक दिन संध्या काल में एक ग्रामवासी भगवान भोलेनाथ के पास आकर बैठ गया। रात्रि होने पर बाबा भोलेनाथ उस व्यक्ति से कहने लगे कि अब तुम अपने घर जाओ मेरा निद्रा करने का समय हो चला है।
 इतना सुनकर वह व्यक्ति रोने लगा और कहने लगा कि भगवान मेरा परिवार दो दिन से भूखा है और मेरे घर में अन्न का एक दाना भी नहीं है। मुझमें उनकी क्षुधा क्रंदन देखने की क्षमता नहीं है,इसलिए मैं रात्रि आपके चरणों में ही बिता दूंगा।
 भगवान भोलेनाथ ये सुनकर बोले अरे भक्त अब मैं कैसे शयन कर सकता हूँ तूने तो मुझे धर्म संकट में डाल दिया है।
  तब भगवान भोले नाथ ने उसे अपने पास से एक घड़े में थोड़ा सा अनाज डालकर दिया और कहने लगे कि इस घड़े में से मुठ्ठी मुट्ठी भर कर अनाज निकालते रहना परंतु इससे पूरा अनाज कभी मत निकालना यदि ऐसा किया तो ये घड़ा सम्पूर्ण रिक्त हो जाएगा। उस परिवार ने तीन माह उस घड़े से मुट्ठी मुट्ठी भर अनाज निकाल कर खाया। फसल आने पर उस व्यक्ति ने घड़े से मुट्ठी से अनाज न निकाल कर, उसे सम्पूर्ण रिक्त कर दिया।

 "इस घड़े को महाभारत काल में पांडवो के वनवास के समय वासुदेव कृष्ण द्वारा महारानी द्रोपदी को प्रदान किये गये अक्षय पात्र के समान माना जाता है"।

  उन्होंने बस्ती के बच्चो से कह दिया कि मेरी कच्ची कुटी के धूने के स्थान से जो भी बच्चा मुट्ठी भर मिट्टी उठाएगा उसे बाहर आकर कोई ना कोई चाँदी की मुद्रा अवश्य प्राप्त होगी। यह भगवान भोलेनाथ का बच्चो के प्रति स्नेह प्रकट करता है। 
  बच्चो ने धूने के स्थान को मुट्ठी मुट्ठी मिट्टी निकाल कर इतना गहरा कर दिया था कि उस स्थान से पानी निकलने लगा था। किसी बच्चे के साथ कोई दुर्घटना घटित न हो जाये इस कारण से उस गडढे को बन्द करवा दिया गया।

 तत्कालीन आवश्यकताओं को देखते हुए भगवान भोले नाथ ने बस्ती को चार कृपाओ से आच्छदित किया...

१. मेरी तपस्थली के क्षेत्र में यदि किसी को सर्प डस लेता है तो उसे उसका विष नहीं चढ़ेगा और ना ही उसकी मृत्यु होगी।

२. इस बस्ती के सम्पूर्ण कृषि क्षेत्र में कभी टिड्डी निवास नहीं करेगी।

३. बस्ती सहित सम्पूर्ण कृषि क्षेत्र में भेडिये का मुंह नहीं खुलेगा।

४. ओलावृष्टि होने पर भी इस बस्ती में कभी अकाल या भूखमरी जैसी स्थिति नहीं आएगी।

  इतने वर्षों में आज तक ऐसा नहीं हुआ कि उनकी तपस्थली में किसी को सर्प ने डसा हो और वो मृत्यु को प्राप्त हो गया हो, न ही कभी भेडिये ने गांव में कोई दुर्घटना की है, न ही आज तक मेरे गाँव में टिड्डी का निवास हुआ है, और न ही ओलावृष्टि होने पर भूखमरी हुयी है।

  भोलेनाथ बाबा की इस महानता को महत्व देते हुये आज भी ग्रामवासी अपनी फसल का प्रथम भाग सावडी के रूप में बाबा भोलेनाथ द्वारा स्थापित शिवमन्दिर में पहुंचाते है।

   बुजुर्गों के अनुसार बाबा भोलेनाथ ने श्री राम जी की तरह गंगा नदी में जल समाधि ली थी। जल समाधि से पूर्व उन्होंने बस्ती वासियों को एक शालिग्राम दिया और कहा की जो मैं हूँ वह ही यह शालिग्राम है।
बस्ती वासियों ने शिवमन्दिर के दाईं ओर उनकी चरण पादुका रखकर उनकी समाधि का निर्माण कराया और उस शालिग्राम को समाधि के ऊपर स्थापित किया।

धन्य होंगे वो बस्ती वासी जिन्होंने भगवान भोलेनाथ के साक्षात दर्शन किये।🙏

  मैं आज स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती हूँ कि मेरा जन्म ऐसे गाँव की धरा पर हुआ है जहां भगवान भोलेनाथ की कृपा रही है। वर्तमान काल में बाबा भोलेनाथ द्वारा लगभग २५० वर्ष पूर्व स्थापित मंदिर की मरम्मत करवाकर उसे भव्यता प्रदान कर दी गई है। जिसमे नित्य पूजा अर्चना की जाती है।

  उस समय जो बस्ती झुग्गी झोपड़ी वाली थी आज वो भव्य भवनों का गाँव बन गया है जिसका नाम वर्तमान में डेरियों है।
 इस समय गाँव में एक प्रथमिक स्कूल, एक जूनियर हाईस्कूल और एक इंटर कॉलेज भी स्थापित हैं।

  मेरी शुभकामनाएं हैं कि भगवान भोलेनाथ की कृपा से मेरा गाँव जिससे मेरी पहचान है सदैव उन्नति के पथ पर अग्रसर रहें।

         कृपा रही यहां उनकी, रहे यहां भगवान
         इस धरा पर जन्मी मैं, यह मेरी पहचान।।

अलका शर्मा
डेरियों (मेरठ)

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