शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

विरह वेदना


शीर्षक :- *विरह वेदना*
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*विरह वेदना के तुम्हे गीत सुनाऊं क्या।*
*हंसी भरी जिंदगी के मित सुनाऊं क्या।।*


*बयां  करते  रहे हम अपनी कहानी को।*
*किताब को अखाबार में छापवाऊँ क्या।।*


*एक एक पन्ने पर यादास्त लिखीं है मैंने।*
*उदगार भाव से उन पन्नो को उड़ाऊँ क्या।।*


*प्रेम में विरह कभी सहा न जाता है यार।*
*आप कहो मैं वह किताब जलाऊं क्या।।*


*चटक चाँदनी जैसी वो लग रही किताब में।*
*कैसे निशा भरे पन्ने पर नाम मिटाऊं क्या।।*


*निभ की नोक ने तो चलने से इनकार किया।*
*वो प्यारा नाम है लिख,निभ को समझाऊँ क्या।।*


*चंचल चितवन जैसा मन था उस पगली का।*
*मन की बांसुरी के स्वर ठहरे मैं इठलाऊँ क्या।।*


*सूर्य की अप्रतिम रौशनी लेकर वो आती थी।*
*सच में उसकी सूरत का राज तुम्हे बताऊं क्या।।*


*वहम नही अहम हुआ है उसे अपने आप पर।*
*मैं सामान्य प्राणी उस सत्य को जुठलाऊँ क्या।।*


*ज़ख्म दिल में लगे है मेरे आंसुओं से क्या कहूँ।*
*हमने कहा दर्द है,बोली नमक ले के आऊं क्या।।*


*सच में समन्दर की लहर सी हो गई जिंदगी।*
*मैं भी लहर पर दौड़ता जहाज बनजाऊँ क्या।।*


*कभी कहती थी वो नदियों की धारा सी है।*
*आप कहो मैं दो किनारा बन तनजाऊँ क्या।।*


*फूल नही है वो तो खिलते कमल की लगती है।*
*वो तान बांसुरी की भँवरे सा गुंजन करपाऊं क्या।।*


*अंतिम  शब्द  बड़े  कठिन  लगे अंतिम पृष्ठ पर।*
*मन नही उस किताब को पुनः खोल पाऊं क्या।।*


*मन्नते बहुत मांगी हमने मंदिरों में जा जाकर पगली।*
*राह तो फिर खाली रही,मन्दिर में फूल चढाऊँ क्या।।*


*उसे किसकी उपमा नही दी मैंने धराम्बर तक।*
*अब उसे अपनी चिता की उपमा दिलाऊँ क्या।।*


*हंसती खेलती जिंदगी में उसने गम भर दिए है।*
*सच में यारों तुम्हें विरह वेदना के गीत सुनाऊं क्या।।*
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              कवि कृष्णा सेन्दल तेजस्वी
                     राजगढ़ धार म.प्र.
                (मों:-८४३५४४०२२३)
Badlavmanch

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