शनिवार, 11 जुलाई 2020

रिश्तों का अहसास

रिश्तों का अहसास

जज्बातें होती रहती है दफन।
विश्वास ओढ़ लेती है कफन।
अंतर्मन में ढूंढ़ती शांति -सुकून ,
कोई आए सुनाए मधुर वचन ।।

थोड़ा वात्सल्य, थोड़ा अपनापन ,
थोड़ा आशीर्वाद, थोड़ा लड़कपन।
मन के तमस को ललकारे प्रभा बनके ,
रूठे मन को मनाए एहसास बनकर ।।

जहाँ झूठ ,छल ,कपट, द्वेष ना हो ,
आडंबर बातों का बोझ ना हो ।।
दोनों अंजुली  में स्नेह भर-भर कर,
जमाने भर की दुआ बटोरकर समेटकर ।।

भावनाओं के अनंत कोमल धागे से,
मन की हर व्याधियों को सील दे।
रिश्ता ऐसा अलौकिक प्राणों में ,
चिर जिजीविषा की किरण भर दे।।

रिश्तो का कोमल एहसास बनें ,
शरशय्या भी सुमन बना दे ।
उन्माद की हर आँधी रोक दे ,
सावन की बूँदाबांदी भर दे।।

दिव्य दुर्लभ स्वाति बूँद सा अनमोल
रिश्ता ऐसा अंतर मन की आँखें खोल ।
जीवन सीपी में ढ़ल जाऊँ मैं,
प्रीतम मोती तेरी बन जाऊँ मैं ।।

झंझावातों तूफानों से टकराकर,
राधे रानी जैसा विरह सहकर।
टिमटिमाती रहूँ, मुस्कुराती रहूँ,
जीवन ज्योति जलाती रहूँ ।।

सख्तियाँ, पाबंदियाँ , मजबूरियाँ,
पँखों को कतर देती है।
दिल को नजरबंद करती ,
शिशु बन मचलने ना देती।।

होठों पर थिरकती हँसी को ,
बेचैनी खिलने न देती ।
जीवन जिंदादिली का नाम है ,
जिंदगी दुआ है सलाम है ।।

मशीनी दुनिया में एक रोबोट,
कलपुर्जे सा कैद, रगड़ता-रगड़ाता  ।
धोबी के कपड़े जैसा पटकाता रहता,
अपने ही मोह जाल में जकड़ता जाता ।।

खुलकर स्वच्छंद चलो जी ले ,
बूंद-बूंद छलकते आनंद को पी लें।
अपने अहम को भुलाकर ,
सारी क्षुद्धता मिटा कर ।।

मन की सहमती सिकुड़ती,
उम्र के साथ बनती गुदड़ी ।
उत्साह के मोती टाँक दे,
जिजीविषा को मरने ना दे।।

रिश्तो के एहसासों की नम्र धूप ,
खुशियाँ लेकर आती सहलाती।
मन के पात्र को बिलोती,
नवनीत आनंद के हिलोर लेती।।

एहसासों के नवीन परवाज से,
नए नज़रिए के आगाज से ।
बच्चे जैसे हर पल नए अंदाज से,
जिंदगी को आओ गले लगा ले।।

सुकून ,शांति प्रेम के
लिए,दूर ना भटके ।
घूँट-घूँट प्रेम के लिए
मोह माया में ना अटके।।

मृगतृष्णा एक जाल है ,
फूलों का फंदा है ।
फँस ना जाए कहीं ,
हँसे और सब को हँसा दे ।।

चलो प्रेम से जिंदगी को ,
गले लगा ले चलो ।
ज़िंदगी रिश्तो का एहसास है,
एहसासों को सजा ले चलो।।

अंशु प्रिया अग्रवाल
मस्कट ओमान
स्वरचित
मौलिक अधिकार सुरक्षित

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