रविवार, 16 मई 2021

धृतराष्ट्र अपनी आँखें खोलो#प्रकाश कुमार मधुबनी'चंदन जी द्वारा खूबसूरत कविता#

*स्वरचित रचना*

हे धृतराष्ट्र अपनी आँखें खोलो
हे धृतराष्ट्र अपनी आँखें खोलो।
अब तो स्वयं राष्ट्रहित में बोलों।
मर्यादा को अपने पहचान कर।
पुत्रमोह से ऊपर राष्ट्र को मानकर।

न्याय का तराजू ले निष्पक्ष भाव से।
कुंठित न हो स्वयं के स्वभाव से।
अपने अन्तः मन का पट खोलो।
अब तो तुम न्यायसंगत बोलो।

शेषनाग  के फन खोलने से पहले।
दबाब में अनुचित बोलने से पहले।
सत्य असत्य का पृर्ण भेद टटोलो।
आवेश से अब ऊपर उठकर बोलो।

अरे युद्ध ताण्डव होने क्यों देना।
बेवजह मारी जाएगी लाखो सेना।
हो सके तो अब भी जागृत हो लो।
हे धृतराष्ट्र अपनी आँखें खोलो।

स्वयं के चमन का रखवाला होकर।
अपनी बहू की लज्जा को खोकर।
क्या अपने पूर्वजों से आँखें मिला सकोगे।
विध्वंस में क्या स्वजनों को बचा सकोगे।

आया है गिरधर फिर तुम्हे जगाने।
भविष्य की आइना तुम्हे दिखाने।
स्वयं व्याकुल मन को स्थिर करो।
हे राजन तुम मरने से पूर्व न मरो। 

*प्रकाश कुमार मधुबनी'चंदन'*

रविवार, 25 अप्रैल 2021

'उन्माद'#सुभाष चौरसिया हेम बाबू महोबा काका जी द्वारा#

"उन्माद "
 चौपालों में जब चौहद्दी खिंच गयी
लगता है  आंगन भी अब बट जायेगा
खिंच गयी जब दीवार दिलों में
"बाबू" अब  अमन चैन कैसे बच पायेगा
चौपालों में------
जात पांत में जंग मची है
सभी धर्म अब अन्धे हैं
ओढ़ लबादा अपने रंग का
धर्मान्धो के उन्मादी फंदे है
उन्माद भरा हो जब जेहन में
तो प्यार दिलों से घट जायेगा
अगर घटा जो भाई चारा
तो दिल ही दिल से कट जायेगा
चौपालों में------
हर श्वांस भरी है नफरत से
कदम कदम उत्पाद मचा है
जब कौमी रंग में इन्सान रंगा हो
तो खूनी रंग से कौन बचा है
बांट दिया अब रहने का ढंग
मंन्दिर मस्जिद का रंग बांट दिया
हांडी पतीली अपने अपने ढंग की
भाषा परिवेश भी बांट दिया
जब जेहन में तलवार हो नंगी
त्रिशूल बसा हो ख्वावों में
सियासत जो घी डाले आहुति में
तो देश दहन कैसे घट जायेगा
चौपालों में------
भूल गये हम अतीत की यादें
कोई भेद नहीं था जलसों में
द्वारकाधीश का विमान सजाता था नूरी
अदभुत शिल्प कला थी कलशों में
भरोसी पर भरोसा था रमजू को
रहमत रतना का मामा था
नहीं बसा था खौफ दिलों में
शंकाओं का न आना जाना था
कितना सरल इन्शान था जग में
नफरत से वो अनजाना था
राम रहीम को धर्मोन्माद ने बांटा
"बाबू " क्या अब रब भी बट जायेगा
चौपालों में-------
हिंदुस्तान की सौंधी माटी में
मजहबी दुर्गन्ध न आतीं थी
रसखान रहीम के ग्रन्थों में
राधा गिरधर को नचाती थी
जब हैवान नचाये जैहादी लय में
मानवता समूल मिट जायेगी
कौमी मदिरा पीकर अब देश का
शायद अमन चैन सब मिट जायेगा
चौपालों में चौहद्दी खिंच गयी
लगता है आंगन भी अब बट जायेगा
रचना कार-  सुभाष चौरसिया हेम बाबू महोबा काका जी
स्वरचित मौलिक सर्वाधिकार सुरक्षित
 संदेश --- मानव धर्म सबसे बड़ा धर्म है

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

क्या यह सही है!#रूपक जी द्वारा खूबसूरत रचना#

क्या यह सही है?......
किसी के कमी को किसी और से पूरा हो तो उस 
कमी को पूरा नहीं होने देना ,क्या यह सही है?

किसी के साथ वर्तमान में खुश हो और पुराने यादों
को याद करके दर्द में खो जाना ,क्या यह सही है?

कोई दूर जाकर बहुत खुश हो तो उसके याद के लिए अभी और कल को खुशी नहीं देना क्या यह सही है?

जो खुशी जिंदगी के बीते पल में नहीं मिल सके उसके 
लिए आने वाले खुशी को नहीं पाना क्या यह सही है?

आने वाले होंठो के मुस्कान को बीते हुए दुख को 
याद करके हमेशा इसे रुलाते रहना क्या यह सही है?

जिनके साथ हम अभी बहुत खुश रहते हो और
हमेशा तकलीफ को याद करना क्या यह सही है?
©रुपक

कुमारी आरती सुधाकर सिरसाट जी द्वारा विषय 'एक किताब बचपन की' पर विशेष रचना#

"एक किताब बचपन की"
एक किताब बचपन की....
आओं फिर से खोलते है....
तोड़कर उन मिट्टी के....
खिलौनों को फिर से जोड़ते है....

बचपन की किताब का वो पहला पन्ना....!
माँ की गोद और पिता की सोच....
माँ के आँचल को फिर से आसमां बनातें है....
पिता की सोच को फिर से ओढ़ते है...

बचपन की किताब का वो दूसरा पन्ना....!!
दादी की वो लम्बी- लम्बी कहानियां....
दादाजी की वो जीवन जीने की राह....
दादी की उन कहानियों को पढ़- पढ कर....
आज हम कहानियां लिखतें है....
दादाजी की राह पर हम आज भी चलतें है....

बचपन की किताब का वो तीसरा पन्ना....!!!
जब पहली बार पाठशाला में पहला कदम पड़ा था....
नये दोस्त, नयी दुनियादारी, नयी सोच से दामन भरा था....
वो....गुरूजी की दाट में भी प्रेम की भावना झलकती थी....
एक नयी ख्वाहिशों की, बचपन की दुनिया थी....
बस यहां तक ही तो दुनिया सारी खूबसूरत लगती थी....

फिर....बसंत पर बसंत बीतते रहें....
किताब के पन्ने खुद ब खुद पलटते रहें....
ओर....हम खुद को खुद में समेटते रहें....
कभी बनतें रहें, कभी मिटते रहें....

हालातों ने परीक्षा लेना शुरू कर दी....
बंधनों ने भी पैरों में बेडियां बांध दी....
जिम्मेदारियों की भी उम्मीदें जगीं....
अनुभवों की जीवन में औढ लगीं....

जब हार कर बैठी जिन्दगी से....
तब अंदर से एक आवाज आई....
इतनी खुबसूरत जिन्दगी की तुमनें
क्या हालत है बनाईं....
!
!
चलों....दिल से एक अरदास करते है....!
आज....फिर से उस दौर में चलते है....!!
!
एक किताब बचपन की....
आओं फिर से खोलते है....
तोड़कर उन मिट्टी के....
खिलौनों को फिर से जोड़ते है....

        कुमारी आरती सुधाकर सिरसाट
         बुरहानपुर मध्यप्रदेश

चंद्रप्रकाश गुप्त चंद्र जी द्वारा विषय' हे कृष्ण फिर प्रकट हो जाओ' पर अद्वितीय रचना#

शीर्षक -  *हे कृष्ण फिर प्रकट हो जाओ*

भय,भूख से गायें रंभा रहीं हैं, ग्वाल बाल, सखियां सभी बुला रहीं हैं

अब भी अघासुर, बकासुर,कंस,पूतनायें मानवता को सता रहीं हैं

हे देवकी नंदन बासुदेव, साकार प्रकट फिर से हो जाओ

जग महाव्याधि से जूझ रहा है, तुम व्याधि विनाशक बन कर आ जाओ

व्यथित हो रहे सभी बहुत हैं, उल्लास की मुरली मधुर बजाओ

विध्वंसों के जो वाद्य बजा रहे , सम्मुख उनके पाॅ॑चजन्य बजाओ

विषैले नागों को नथ कर,हम सबको मुक्ति दिला जाओ

सुयोग्य पार्थ लाओ फिर से, स्वयं सारथि वन कर आ जाओ

हमारे राग, विराग,रोम रोम,मन हृदय में रम जाओ

वन ,उपवन,वीरान जन जन की चेतना में समा जाओ

सागर,सरिता , बूंद,धरा, व्योम के कण-कण में समा जाओ

अणु रूप है तुम्हारा, विराट बन कर हम सब में समा जाओ

अरूप हो तुम असीम रूपवान,हम सब के रूपों में समा जाओ

सुख, दुःख, यातना, संघर्षों में सदा के लिए व्याप्त हो जाओ

फिर हम विष पान भी कर लेंगे ले कर नाम तुम्हारा

तुम हो है यह अमिट अभिमान मेरा,है कन्हैया नाम तुम्हारा

करुणा करो कृपा निधान,अब साथ दो हमारा

त्रिभुवन में न कोई दूजा हमारा,बस है सहारा तुम्हारा

हे देवकी नंदन बासुदेव साकार प्रकट फिर से हो जाओ......

जग महाव्याधि से जूझ रहा है, तुम व्याधि विनाशक बन कर आ जाओ

भय ,भूख से गायें रंभा रहीं हैं ग्वाल बाल सखियां सभी बुला रहीं हैं

अब भी अघासुर,बकासुर, कंस, पूतनायें मानवता को सता रहीं हैं


              जय श्री कृष्ण


            चंद्रप्रकाश गुप्त चंद्र
                ( ओज कवि ) 
           अहमदाबाद, गुजरात

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          सर्वाधिकार सुरक्षित
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मेरा प्यार#हरप्रीत कौर जी द्वारा अद्वितीय रचना#

समुंद्र की गहराइयों
सा है मेरा प्यार।
जिस प्रकार समुंद्र के
किनारे बैठ कर जो सुकून
मिलता है।उसी तरह तेरे आगोश
में आकर मुझे वो खुशी मिलती है
जो मैं बयां नहीं कर पाती।
जैसे जैसे समुंद्र की लहरें उठती है,
वैसे वैसे मेरा दिल तुझ से मिलने को
बेकरार होता है।
मैं तेरे प्यार में समुंद्र की गहराइयों की
तरह खो जाना चाहती हूं।
जैसे समुंद्र अपने अंदर कितने राज
छुपाए बैठा है,
समुंद्र की तरह तेरा प्यार भी मेरे दिल
राज बनकर छुपा बैठा है।
हरप्रीत कौर

रुपक जी द्वारा अद्वितीय रचना#क्यों खुदा#

क्यों खुदा?..............
खुदा अब कभी भी तुमसे खुशी नहीं मांगेंगे
चाहे जीवन भर दर्द ही सहना पड़े तो सहेंगे

पल भर खुशी तो देता नहीं बदले गम देता है
रोकर गुजारना है जिंदगी तो रोकर गुजारेंगे

क्यों हाथ उठ जाता है खुशी मांगने के लिए?
जबकि पता है कभी वो खुशी नहीं मिलेंगे

ना क्यों झुक जाता है ये मस्तक तेरे दर पर?
जानते है खाली लौटते है, खाली ही लौटेंगे

किसी को देखकर जीने की इच्छा हो जाती है
रोते हुए दिन गुजरा है रोते ही जिंदगी गुजारेंगे

किसी की चाहत रुपक को मरने से डरा देती है
जबकि पता है एक दिल जरूर मौत पास आयेंगे
©रुपक

तुमसे मैं परिपूर्ण हूँ#मधु अरोड़ा जी द्वारा खूबसूरत रचना#

तुमसे मैं परिपूर्ण हूं
नारी तुमको हर रूप में पाकर 
मैंने खुद को पूर्ण किया
 बेटी रूप में तुमको पाकर 
 गर्व से मैं फुला ना समाया 
 मेरे घर आंगन की खुशबू
 मेरे दिल का टुकड़ा बन 
 दिल के बहुत करीब पाया
 
  बेटी तो है धन  ही पराया
   ऐसा कहने वालों की सोच पर 
   मुझको बहुत तरस है आया 
   अरे बेटी तो वह अनमोल रतन हे
    जो दो कुलो को जोड़ती है
     बचाने कुलो की मर्यादा
      संयम ,क्षमा, शक्ति ,शील
      ममता अपनत्व से 
      दिलो की कडियां जोड़ती हैं
      
       त्याग उसका कितना है
       तुम ने समझ पाओगे 
       जाकर वह दूसरे घर 
       अमृत बेले बन जाती 
        जिन माता पिता ने जन्म दिया
         दूजो को   अपनाती है
         
         धर्म ,रीति-रिवाज, तुम्हारे घर के
          सब वह निभाती है
          कदम कदम पे साथ तुम्हारे चलती
          तनिक नहीं घबराती है 
          बनकर पेड़ तुम्हारे घर का 
           घर आंगन खुशबू से महकाती है
           
         नाजुक सी कली किसी की 
         फूल बन तुम्हारे घर का
          घर आंगन   दमकाती हैं
          नाज करो तुम इन रिश्तों पर
           माता ,बहन , सहचरी बन 
           तुम्हारा जीवन पूर्ण कर जाती।।
                       दिल की कलम से
                       मधु अरोड़ा
                       9.4.2021

नई टेक्नोलॉजी और हमारा जीवन#मधु अरोड़ा जी द्वारा अद्वितीय रचना#

नई टेक्नोलॉजी और हमारा जीवन
 
  अब से लगभग 50 साल पुरानी है। जब घरों में ज्यादा सुख सुविधाओं के साधन नहीं होते थे, कमाने वाला एक और खाने वाले 10 लोग होते थे ।क्योंकि तब संतान भी ज्यादा होती थी ,एक कमाता था सब खाते थे। उस समय
 एक या दो बच्चों का चलन नहीं था ,5,6 या इससे भी ज्यादा बच्चे हुआ करते थे ।घर की छोटी से छोटी सुख सुविधाएं की चीजें आना दिल को खुश कर दिया करता था।
  जैसे कुकर, गैस धीरे-धीरे टेलीविजन आ गया जिसे देखकर तो खुशी का ठिकाना नहीं रहता था बस सप्ताह में एक पिक्चर एक चित्रहार आया करता था धीरे-धीरे धारावाहिक आने शुरू हुए और फ्रिज को तो लोग ठंडे पानी की मशीन कहते थे छोटी-छोटी वस्तुएं पता नहीं धीरे-धीरे कैसे हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गई पता नहीं वह चीजें कैसे मां-बाप लाते थे धीरे-धीरे टेलीफोन आ गए बोलने में पहले किसी एक के यहां आता था तो उसी का नंबर दे देते थे जिंदगी धीरे-धीरे आसान होने लगी जीवन में सुख सुविधाओं के साधनों ने जगह लेनी शुरू कर दी वाशिंग मशीन कूलर एसी जैसी वस्तुएं अहम होती चली गई आने जाने के साधन सुगम होते चले गए सरकार ने है राज्य हर छोटे बड़े गांव की तरक्की पर ध्यान दिया बस रेल और हवाई जहाज की सुविधाएं आसानी से उपलब्ध होने लगी अब दूरियां कम हो गई और अब 2०, 25 साल से फोन आते चले गए धीरे-धीरे फोन लेना अब इतना आसान हो गया और अहम हो गया कि बिना फोन के जीवन जीने की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता घरों में जितने लोग हैं उतने ही फोन में वाई फाई नेट लैपटॉप आदि सब से व्यापार और लोगों से बात करने का ढंग बदलता चला गया पिछले साल कोरोनावायरस के फैलने सेजीवन इन आधुनिक उपकरणों के कारण आसानी से काटा गया।
   ज़ूम पर मीटिंग के जरूरी काम बच्चों के क्लासेज इत्यादि होने लगे और कोरोना के चलते ,हम -तुम भी इस उपकरण के जरिए जुड़ गए अच्छे-अच्छे लेख को को पढ़ने और दोस्त बनाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ रश्मिरथी प्रतिलिपि बदलाव मंच आदि से जुड़ने का अवसर प्राप्त हुआ प्रतिभाशाली लेखकों के लेख पढ़ने और सुनने का अवसर प्राप्त हुआ इन उपकरणों के जरिए एक दूसरे को देख कर वीडियो कॉलिंग कर दूर होते हुए भी निकट होने का एहसास हुआ ।
  गूगल के जरिए तो न जाने कितनी परेशानी समाप्त हो गईआसानी खाना बना लो ।जहां जाना जगह पूछ लो, सब कुछ इसके माध्यम से सीख लो, एक साथ कहीं जवाब मिल जाते हैं।  उपकरणों का जीवन में खास स्थान होता जा रहा है ।
  परंतु इन सब के साथ कुछ दोष भी समाज में फैल रहे हैं बच्चे ऑनलाइन शिक्षा के कारण मोबाइल प्रेमी हो गए हैं कुछ वह अपने मन से खेलते हैं, और कुछ मां-बाप लेकर बैठा देते हैं ।मेरा मां-बाप से अनुरोध है कि वह बच्चों को उतनी ही देर फोन दे जितना जरूरी है अन्यथा शरीर के सब अंगों पर उसका असर पड़ेगा वह तो सब जानते हैं कि सब चीजें फायदे की नहीं होती हर चीज के कुछ नुकसान भी होते हैं वैसे यह आधुनिक टेक्नोलॉजी हमारे बहुत काम की है अगर हम इसका सही इस्तेमाल करें तो?
                      स्वरचित 
                      दिल की कलम से 
                      मधु अरोड़ा
                       8.4 .2021
                      शाहदरा ,दिल्ली

रीमा ठाकुर जी द्वारा विषय 'पीले फुल' पर खूबसूरत रचना#

मुक्ति (पीले फूल)रीमा ठाकुर ( लेखिका)
भाग ---3
अब तक माँ को ,जमीन पर सुला दिया गया था।नीरु वही जमीन पर बैठी,माँ को भावशून्य देखे जा रही थी""""""
सपाट चेहरा,आँखो से,झरझर बहते आँसू,""""
अचानक,से नीरु की नजरो .के सामने,जाने कितनी ,तस्वीरे उभरने लगी,,,,
माँ कितनी खूबसूरत थी,बिल्कुल  गोरा मुखडा ,धानी साडी मे तो साक्षात .अप्सरा दिखती थी,बाबा भी तो माँ के दिवाने थे"
वो माँ को कभी छोडती ,न थी !माँ भी तो उसे कितना प्यार करती थी।जब छोटा भाई ,कोख मे आया तो,माँ बहुत रोई"
माँ ,नही चाहती थी!की उनकी बेटी का प्यार बँटे,,,,,
फिर दादी ने बहुत समझाया,की बेटी घर चली जाऐगी तो"
कौन सम्भालेगा""""
कुछ महीनो बाद रूई सा मुलायम गोरा चिट्टा भाई माँ की गोद मे था।नीरू को तो जैसे खिलौना मिल गया"""""
दिन बीत जाता पता ही नही चलता,,,,,
कुछ दिनो तक सब अच्छा चलता रहा,फिर माँ बीमार  रहने लगी"उनका गोरा मुखडा तबाँई होने लगा'''''
शरीर सूखने लगा,फिर धीरे धीरे,माँ कमजोर होती चली"गई
बहुत इलाज करवाया पर कोई फर्क न पडा""""":
कुछ दिन पहले दादी चल बसी,अब माँ को संभालने वाला कोई न था!
नीरू समय से पहले बडी हो गई ,जिस उम्र मे बच्चे खेलते उस उम्र मे नीरू चौका चूल्हा और भाई को सम्भाँलने लगी""""""
कुछ समय पहले ,माँसी,भाई को अपने साथ ले गई,
और घर मे पेसे की कमी के,चलते ,बाबा को भी शहर 
जाना पडा""""
पडोस मे काका काकी रहते,थे,,
जो उनके लिऐ भगवान से कम नही थे""""
नीरू कहाँ खो गई"उठ जा बेटा"""
काकी की  आवाज से उसकी  तन्द्रा टूटी,,,
सामने उसकी दोस्त मधु खडी थी""""मधु उसके करीब आ 
गई"""""
मधु ने नीरू को भीचकर गले लगा लिया"हमदर्दी मिलते ही नीरू ""सिसक पडी,
मधु देख माँ नही बोल रही,मधु कुछ न बोल पाई"उन दोनो की सिसकियों से सारा महौल गमगीन हो गया"""""":कृमशः
आगे जारी भाग --4""""""      रीमा ठाकुर ✍️🏻🙏🏼
प्रिये पाठको आपको ये भाग कैसा लगा जरूर बताये """"
आगे बहुत दिलचस्प मोड आने वाला हे।🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

वरदान हो तुम#मीनाक्षी कुमावत'मीरा' द्वारा खूबसूरत कविता#

कविता शीर्षक - वरदान हो तुम
**************
श्रद्ध तरंग की सुगंध बिखरते,
वसंत से मनोरम अहसास हो तुम।
बसते हो कहीं,बहते हो कहीं, 
जीवन की प्रेम भरी पुकार हो तुम।

छंद नृत्य  संगीत के क्षण में,
भीतर बहते अनुराग हो तुम,
उत्सव मनाती भोर किरण सम,
हर दिन की नयी शुरुआत हो तुम।

शांत नीरव गगन पर जैसे,
सौरभ लुटाती स्वर्णाभ हो तुम,
स्मृति की पगडंडी पर छुपकर,
उतरी मौन पदचाप हो तुम।

सागर में अस्तित्व मिलाने को आतुर,
इस बूंद का अरमान हो तुम।
तुम्हीं से तुम्हीं तुम घटते हो,
प्रकृति पर अलौकिक वरदान हो तुम।
**********
मीनाक्षी कुमावत'मीरा'
रोहिड़ा (पिंडवाड़ा)
माउन्ट आबू,राजस्थान

प्रकाश कुमार मधुबनी'चंदन'जी द्वारा खूबसूरत कहानी#अन्नू का संघर्ष#

*स्वरचित रचना*
*अन्नू का संघर्ष*

अन्नू सुबह सुबह उठी तो रोज की तरह चिल्लाई मम्मी मम्मी
कहाँ हो।मम्मी बोलो ना,बोलो तो ये आवाज लगाते हुए जोर जोर से पूरे घर में घूम ली लेकिन मम्मी नही मिली तभी अर्चना
आंटी ने जवाब दिया बेटा तुम्हारी माँ यहां नही है।वो कही गई है साम तक आ जाएंगी तुम जाकर तैयार हो जाओ।मैं नाश्ता लगा देती हूँ।ये सुनते ही अन्नू को पूरा घर जेल की तरह लग रहा था। यू तो हर रोज उसे महारानी की तरह महसूस होता था।
किंतु आज उसे पूरे घर माँ के बिना बिलकुल अच्छा नही लगता था।अन्नू के समझ में आखिर आज माँ बिन बताये कहाँ चली गई।अन्नू को अचानक उसे ध्यान आया रात में पापा व मम्मी के आपसी झगड़े के आवाज का ,कही उसी कारण तो नही कही मम्मी बिना बताये घर छोड़कर तो नही चली गई।
अन्नू ये सोच कर जोर जोर से रोने लगी।अन्नू की आवाज सुनकर आंटी आई अन्नू क्या हुआ क्यों रोना धोना लगा रखा है।चुप हो जाओ तुम्हारे पिताजी सो रहे है।चलो अब नास्ता कर लो। अन्नू बोली मुझे नही खाना तभी आंटी ने दो चार थप्पड़ लगा दिए। फिर क्या था।अन्नू पूरे दिन रोते हुए बैठी रही। साम को अन्नू के सामने अर्चना आंटी ने दो रोटियां व बैगन की सब्जी डाल दी। अन्नू को बिल्कुल अच्छा नही लग रहा था।कुछ खाई नही थी क्या करे आखिर समझ में नही आ रहा था। रोते रोते सो गई।रात में जब उसकी नींद टूटी तो पिताजी को शराब में धुत्त होकर चिल्लाते सुना।कि अर्चना अब तुम ही मेरी पत्नी हो मैं हरगिज़ नही चाहता कि प्रीति यहाँ आये।आखिर वो समझती क्या है वो अपने आपको।
अन्नू उम्र से 13 वर्ष की थी किन्तु उसकी सोच 33 वर्ष मानो 
मुझे कहती थी कि पीकर मत आया करो।एक तुम हो मुझे कभी पीने से नही रोकती बल्कि अपने हाथों से पिलाती हो। तुम मेरी जान हों।तुम मेरी सबकुछ हो।ये कहते हुए शराब का बोतल फोड़ दिया।ये अन्नू किवाड़ के ओट से सुन रही थी।उसे बहुत रोना आया वो बहुत व्याकुल हो गई किन्तु उसका सुनने वाला कौन था।यू तो पहले अन्नू की माँ थी जो उसके सर पर प्रेम से हाथ फेर देती थी तो उसको जैसे जड़ी बूटी मिल जाता था।अब कौन था भला जिससे वह कहती कि उसका शरीर जल जा रहा है। पूरी रात वह सो नही पाई।अर्चना अब ना तो किसी से बात करती थी नही किसी से मिलती जुलती थी।अब सुबह सुबह कहाँ कोई पूछने वाला था।पिताजी तो बस उस अर्चना आंटी के साथ अगले कमरे में पड़े रहते थे।अब क्या था
अन्नू को अकेलेपन खाये जा रहा था किंतु वह क्या करे।अब समय बीतते गए व अन्नू अकेलेपन से बचने के लिए अन्नू ने लेखनी को अपनी सहेली बना लिया।वह बन्द कमरे में लिखती रहती है।
*प्रकाश कुमार मधुबनी'चंदन'*

रविवार, 18 अप्रैल 2021

सुभाष चौरसिया जी द्वारा#किसान#

कविता
   "किसान "
मैं हूँ भारत देश का किसान
बदहाल जिन्दगी जीता हूँ
 निज तन का सीना फाड़ कर, 
जमीन को चीरता हूँ
उम्मीदों के बीज बो कर
 देश के भविष्य को संवारता हूँ
मै हूँ धरती पुत्र
किसान कहलाता हूँ
 लहू और श्रम जल से सींच कर
फसलें  उगाता हूँ
उपजाता  हूँ अनन्य फसलें
जगत के भरण पोषण के लिए
विपन्नता  की रोटियों को
क्षुधा की आंच पर पकाकर
आश्वासनों की थाली में परोस कर
परिजनों को खिलाता हूँ
भरता हूँ  उदर उनका
आधा अधूरा ही सही
लेकिन मैं अपने पेट में
गांठ बांध भूखे ही
दुर्गति का कफन ओढ़
सो जाता हूँ
 दफन हो जाता हूँ 
अनंत चिंताओं के बोझ तले
कुदरत और सरकार के
दो पाटों में पीसा जाता हूँ
क्योंकि मै किसान हूँ
सर्दी, गर्मी, बरसात  क्या
मेरे लिए सभी  एक से
अर्ध तन वसन में
जिन्दगी बिताता हूँ 
सारा जग  सोता है जब
मैं सारी रात जागता हूँ
खेत की रखवाली को
🐮🐂🐄पशुओं को ताकता हूँ
सहेज कर उम्मीदों को
आसाओं के आसमां तले
 निष्ठुर घटाओं को
हृदय से पुकारता हूँ
सरकार को क्यों दोष दूं
जब भगवान ही नहीं रहम दिल
अपना हक अपनी मजदूरी 
ही तो मैं मांगता हूँ
मांगता हूँ पानी
सूखी धरा के लिए
पानी की एवज में
 आश्वासन का अनुदान
भीख में मिल जाता है
कृषि प्रधान देश का
भिखारी  सा किसान है
भारत देश  तो महान है
लेकिन किसान कहाँ इन्सान है
आज किसान देश का
खो रहा अपनी जान है
मांगता है वाजिव दाम
अमोल मोती दाने अन्न का
तो उसकी पीठ पर
लाठियां बरसाईं जाती है
जब लद जाता है कर्ज से
कर्ज के बोझ को
जब नहीं सहन कर पाता है
नहीं दिखता है विकल्प कोई
जान देने के सिवा
निज रोपे दृख्त से लटक कर
फांसी पर चढ़ जाता है
आज देश का किसान
दुर्गति के दुष्काळ में
फंस कर मर जाता है
मजबूरी में जान गवांता है

रचना कार- सुभाष चौरसिया हेम बाबू महोबा काका जी 
स्व रचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित

ऑनलाइन पढ़ाई -फायदे और नुकसान#वंदना खरे जी द्वारा खूबसूरत रचना#

दिन गुरुवार 
8/4/2021
ऑनलाइन पढ़ाई -फायदे और नुकसान
 फायदे तो एक या दो होंगे लेकिन, नुकसान बहुत हैं ।बच्चों को सर्वाइकल की प्रॉब्लम शुरू हो गई, बच्चों को चश्मे लग गए आंखों की प्रॉब्लम हो गई ,और एक समय था जब बच्चों को मोबाइल से दूर रहने की सलाह देते थे ।आज हम खुद उन्हें मोबाइल खरीद खरीद कर दे रहे हैं। लैपटॉप खरीद कर दे रहे हैं ,24 घंटे में करीब 12 घंटे या 15 घंटे बचे लैपटॉप या मोबाइल में काम कर रहे हैं ।तो बहुत समस्या हो रही है ,बहुत सारी बीमारियां जन्म ले रही है। जो बहुत हानिकारक है, बच्चों के लिए ,लेकिन यह कोरोना हम सब को जो जो दिन ना दिखायें।जो कि हम सब को दिखाएं हम सब देख रहे हैं जी और उसके परिणाम भी सामने आ रहे हैं। पैदा हो रही हैं नित नई समस्यायें ,लेकिन कुछ नहीं  है हमारे बस मैं,क्योंकि हमें कोरोना से बचना है तो उनसारे नियम जो सरकार के नियम है, वह हमें पालन करने होंगे उनकी गाइडलाइन के हिसाब से हमें चलना होगा। मास्क भी लगाना होगा, घर पर भी रहना होगा ,हाथ भी धोने होंगे ,और हर नियम का पालन करना होगा । बच्चों के भविष्य का सवाल है ऑनलाइन पढ़ाई उन्हें जरूर करनी है, और वह कर भी रहे हैं । अपनी सेहत का ध्यान रखें। टीचर एक अध्यापक कितना परेशान है, ऑनलाइन क्लास के चलते , 10 घंटे 12 घंटे 15 घंटे 18 घंटे टीचर मोबाइल या लैपटॉप से कंटिन्यू क्लास अटेंड कर रहे हैं। तो हर तरह से देखा जाए तो सब कोई परेशान है इन ऑनलाइन  क्लास से ।।

वंदना खरे समाज सेविका चचाई जिला अनूपपुर मध्य प्रदेश

आज पहली बार लेख लिखने की कौशिश की है।।

मीनाक्षी कुमावत'मीरा' जी द्वारा अद्वितीय रचना#वरदान हो तुम#

कविता शीर्षक - वरदान हो तुम
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श्रद्ध तरंग की सुगंध बिखरते,
वसंत से मनोरम अहसास हो तुम।
बसते हो कहीं,बहते हो कहीं, 
जीवन की प्रेम भरी पुकार हो तुम।

छंद नृत्य  संगीत के क्षण में,
भीतर बहते अनुराग हो तुम,
उत्सव मनाती भोर किरण सम,
हर दिन की नयी शुरुआत हो तुम।

शांत नीरव गगन पर जैसे,
सौरभ लुटाती स्वर्णाभ हो तुम,
स्मृति की पगडंडी पर छुपकर,
उतरी मौन पदचाप हो तुम।

सागर में अस्तित्व मिलाने को आतुर,
इस बूंद का अरमान हो तुम।
तुम्हीं से तुम्हीं तुम घटते हो,
प्रकृति पर अलौकिक वरदान हो तुम।
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मीनाक्षी कुमावत'मीरा'
रोहिड़ा (पिंडवाड़ा)
माउन्ट आबू,राजस्थान