गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

सुधीर श्रीवास्तव जी द्वारा अद्वितीय कविता#ले ही लू#

ले ही लूँ
********

आ गई है होली, थोड़ा सा तो पी लूं ,
बीत गया है अर्सा थोड़ा तो बहक लूँ।
देखता हूँ तो कुछ अच्छा नहीं लगता,
बस थोड़ा सा लेकर कुछ अच्छा हो लूँ।
पीना अच्छा नहीं है पता तो मुझे भी है
थोड़ा सा जीवन का कुछ मजा तो ले लूं।
पीकर बहक जाऊं ऐसा नहीं हो सकता
नाली में गिरने का अनुभव तो कर लूं ।
राज की बात है किसी से भी मत कहना
बीबी के लात घूसों का स्वाद तो चख लूँ।
होली है तो होली का खूब आनंद उठा लूँ
पीता नहीं हूँ,पीने का नाटक तो कर लूं।
आया है आज फिर से त्योहार होली का
आज तो आप सबका आशीष ही ले लूँ।
◆ सुधीर श्रीवास्तव
       गोण्डा, उ.प्र.
  
©मौलिक, स्वरचित,अप्रकाशित

होली के बहाने#देवंती देवी जी द्वारा#

कलम की ध्वनि से 
विषय __होली के बहाने
 विधा__ _कविता
ओ मेरे साॅवरा, मैं तो तेरे  प्यार में पागल हो गई।
तुम्हारे प्यार में दिल की, मेरी शुद्ध बुद्ध खो गई।।

अबकी होली में आना, फिर नहीं जाना श्याम।
तुझे देखे बिन मेरा देखो क्या हुआ हाल  श्याम।।

पनघट पर जाऊॅ तो मैं  तेरी ही राह निहारुॅ।
मुरली की धुन सुनने को जमुना के तट जाऊॅ।।

कभी तो अपनी राधा को, छोड़के तुम आओ श्याम।
कभी अपनी सखियों को अपने गले लगाओ श्याम।।
नैना तरसे,अखियाॅ बरसे अब नहीं तडपाओ श्याम।
होली के बहाने आप  मेरे घर आ जाओ  श्याम।।
- देवंती देवी

सुथार सुनील एच. “कलम” जी द्वारा विषय होली पर अद्वितीय रचना'#

होली आई...
रंगों की बौछार होवे, मोज मनाओ मिलके मेरे भाई
खुशियोकी लहरे चारों ओर फैलाई, देखो होली आई 

गांव चौरे मिलके, होली दहनकी कर लोग तैयारी
होलिकाकी आगमे, सबने  मिलके बुराईया जलाई

अबिल गुलालके रंग तरंग, अम्बरमें लहर लहराई
ढोल नगाड़ों संग तासकने, ताल जोरोकी लगाई

सघला मिलने मोज मनावे, बच्चोकी प्यारी माई
जैसे ब्रिजमे धूम मची गोपी संग, वैसी धूम मचाई

उछल उछल सोग बाजे, खेलाईया ने गेर नचाई
बांध घूघरा नाचे भाभस, ओर जोर ताल मिलाई

हर गली महोलोमे, रंगोसे होली खेले लोग लुगाई 
घेरा घेरा रंगसे, ननद भोउजाईकी चुनरीया रंगाई

सत्यकी राह पर, प्रहलाद को इश ने जीत दिलाई
"कलम" की और से, पावन त्योहारकी ढेरो बधाई

सुथार सुनील एच. “कलम”
एम.पी.सी.सी. भाडोत्रा, कम्प्यूटर शिक्षक
गाव- रानोल , ता. दांतीवादा,बनासकांठा

प्रकाश कुमार मधुबनी'चंदन' जी द्वारा गाँव की होली पर खूबसूरत रचना#

*स्वरचित रचना*
*गाँव और शहर की होली*

गाँव में होती हँस की ठिठोली।
शहर में द्वेष दिखावटी होली।

गाँव में प्राकृतिक रंगों का संचार।
शहर में होता भावना का व्यापार।

गाँव में भौजी देवर का हुरदंग।
शहर में आतातायीयों का दबंग।

गाँव में कच्चे घरों में खुश इंसान।
शहर में टूटा दिल व पक्का मकान।

गाँव में लेते बुजुर्गों से आशीर्वाद।
शहर में छोटी छोटी बात पर विवाद।

फीका है जिसके आगे चंदन रोली।
ऐसी है होती मेरी गाँव वाली होली।

गाँव में पुआ और गुजिया की भरमार।
शहर में तो बियर शराब की बयार।

गाँव में निकले शिव पार्वती की डोली।
ऐसी होती बेहतर शहर से गाँव की होली।

*प्रकाश कुमार मधुबनी'चंदन'*

अनिल मोदी, जी द्वारा#मुक्तक#

तिथि 14 - 03 - 2021
विधा मुक्तक
हंसी है बेटियों की रंगों की फुहार
झुमती नाचती है गाती है मल्हार
खुश होे पापा के बाँहो में झुमती
झुमता संग संग सारा घर परिवार

अपने हाथो से बनाके लाती गुझिया
खिलाके सबको खुश होती बिटिया
पायल की छम छम मधुर संगीत से
लगती है अंबा गौरी लक्ष्मी बिटिया।

हर अनदेखी को सह लेती
चाहे अभावो भरा जीना हो
हर अभाव को स्वभाव बना
रंगों सी मुस्कुराती है बिटिया

कभी होलिका सी बन जाती है
कभी अनुसुइया बन जाती है
कभी विरागंणा लक्ष्मी बाई जैसी
रण में दुश्मन से भिड जाती है।

कभी रांझा की हीर बन जाती है।
कभी पद्ममीनी जौहर कर जाती है
कभी कल्पना चावला सी चाँद पर
रंग अनेको खूब बिखराती है

रंग अनंत है बिटिया के
हर रंग अनुपम लगती है
जिस रंग में भी देखुं उसै
प्यार के रंग बरसाती है।

अनिल मोदी, चेन्नई

कृष्णा सेन्दल तेजस्वी जी द्वारा#बदलाव मंच#

*होली महोत्सव एवं होलिका दहन की*
   *की हार्दिक -हार्दिक शुभकामनाएं*
समरसता  का  समाज  में  बरसे  रंग।
समाज  समृद्धशाली  हो  न  हो  जंग।।

बुराई  पर  रंग  लगा  अच्छाई  कर।
प्रेम  स्नेह  का  गुलाल लगा जी भर।।

प्रहलाद सी भक्ति की सदा ज्योति जला।
अहम विनाश हो बुराई तज कर भला।।

होली  में  उमंग  सप्त  नव  तरंग  हो।
भाई  सब  महोत्सव  में  संग संग हो।।

द्वेषता  का  भाव  मिटे  सदा  के  लिए।
कदम  मिलाकर ही चले सदा के लिए।।

अरिदल  षड्यंत्र  होली  में जल जाए।
सभी  विपदाएं  पल  में ही टल जाए।।

फाल्गुन  महीना  मीठे  फाग  सुनाएँ।
सभी जन मिलकर होली पर्व मनाएँ।।


*कृष्णा सेन्दल तेजस्वी*
           राजगढ़ ,मध्यप्रदेश

अम्बिका झा जी द्वारा विषय होली पर अद्वितीय रचना#

रंग बिरंगे रंग भरी पिचकारी है 
गोपियन संग नाच रहे कृष्ण कन्हाई है
जिसे देख-देखकर  राधा,
सुध-बुधअपनी बिसराई है।

फिजा में फैली प्रीत मिश्रित
केसर, कुमकुम, गुलाल है।
सप्त रंग में रंगा है मन
पवन बहे पुरवाई है।।

कोयल मोर पपीहा के संग 
मनप्रीत तरंग बन छाई है।।
इंद्रधनुष के रंगों से हिलमिल 
ऋतु बसंत की आई है।।

मनमोहन चितचोर सजन के 
हाथों में पिचकारी है।।
तन मन पावन निर्मल हो कर
मन बज रही प्रीत की शहनाई है।।
                   अम्बिका झा

बाबूराम सिंह कवि जी द्वारा#प्यारा होली का त्योहार#

प्यारा होली का त्योहार

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श्रध्दा स्नेह सद्भाव बढा़ता ओर परस्पर सभी में प्यार।
सद्  शिक्षा  का  प्रतीक  है  प्यारा होली  का त्योहार।।

होली हुलसित सबको करता,जीवन उमंगों  से  भरता।
दुख दर्द सबहीका हरता,नियत समय सेकभी न टरता।
होलीमेंसब पगहैधरता,अबीर गुलालसे ना कोई डरता।
नगर शहर और गांव-गांव में,सतरंगी पिचकारी झरता।

हिल-मिल सब कोई उडा़ता चहुँदिश रंगों का बौछार।
सद्  शिक्षा  का  प्रतीक  है प्यारा होली  का  त्योहार।।

ऊँचनीच,सबभेद भुलाकर मूढ़ गँवार ज्ञानीअति नागर।
समहो जाते मालिक चाकर,मिलते हैसब प्रेमसेआकर।
भरता जब रंगों की गागर,बहता है तब प्रेम का  सागर।
हर वर्ष होली आती-जाती,सभी को सच यहीं बताकर।

परम पिताकी सबसंतानें,सकलविश्व अपना  परिवार।
सद्  शिक्षा  का  प्रतीक  है प्यारा होली  का  त्योहार।। 

बसकोई सबकोगले लगाता,बैर विरोध सबदूर भगाता।
कोई नाचता कोई गाता,पूडी़  पकवान मिठाई  खाता।
होली है हर-हरको भाता,सभीसे सबकोई आके पाता।
प्यारभरा जीवन ही जगमें,सबही का है भाग्यविधाता।

अग-जग में कर्म ही सबका"बाबूराम कवि" है आधार।
सद्  शिक्षा  का  प्रतीक  है प्यारा  होली  का  त्योहार।।


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बाबूराम सिंह कवि
बड़का खुटहाँ, विजयीपुर
गोपालगंज(बिहार)
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श्रीमती देवन्ती देवी चंद्रवंशी जी द्वारा#भोर का नमन#

विषय__ भोर का नमन
विधा_______ कविता
हे भगवान इतना वर दो
मुझ पतित मानव को
मानव को पुर्ण ज्ञान
जो प्राप्त ना हो पाया
पीड़ितों को कल्पवृक्ष 
कल्याण अमर हो जाए

शिव सत्य सुन्दर को 
मानवता मनमें लिए हुए
धर्म पथ अपनाकर 
आगे वह बढ़ते हीं जाए

अत्याचार दुष्प्रभाव 
छोड़ करके हर मानव 
उपकारी बनके
निस्वार्थ भाव सेवा
सबका करते जाए

भगवान इतना भक्ति दो
दूसरों का सेवा कर पाए
भगवान इतना ज्ञान दो
माता-पिता का सेवा कर पाए

सभी देव देवियों को 
कोटि-कोटि नमन

      श्रीमती देवन्ती देवी चंद्रवंशी
              धनबाद झारखंड

गीतापाण्डेय अपराजिता जी द्वारा#कुंडलियाँ#

कुंडलियाँ
शीर्षक होली
1  आज मचा हुडदंग है ,गांव गली सब ओर।
 डगर डगर में हो रहा, जनमानस का शोर।।
  जन मानस का शोर ,उछलते  कूदे सारे।
रंगों से सराबोर , नाचते सब हुलियारे।
है उजास की भोर, बजते सतरंगी साज।
 प्रीत प्यार का जोर, मना रहे होली आज।

2 होली के त्योहार में, खुशियां छाई अपार।
श्याम रंग राधा रंगी, मस्त मगन संसार।।
मस्त मगन संसार , बोलते सुंदर बोली।
 बांधे मन का तार, प्रीत भरते हमजोली।।
 मन में भर उल्लास, रही बच्चों की टोली।
  फागुन उत्सव मास, खेल रहे खूब  होली।।


गीतापाण्डेयअपराजिता रायबरेली उत्तर प्रदेश

होलिका दहन#गायत्री ठाकुर जी "सक्षम"द्वारा#

*होलिका दहन*
     राक्षस राज हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद विष्णु भक्त था। हिरण्यकश्यप ने अपने राज्य में मुनादी करवाई थी कि सभी उसको भगवान माने एवं नारायण का नाम न लें। उसने प्रहलाद को मरवाने  के लिए कई बार प्रयत्न किए किंतु वह हर बार बच गया। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को अग्नि से नहीं जलने का वरदान प्राप्त था। हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को होलिका की गोदी में बैठा कर अग्नि लगा दी किंतु भगवान की कृपा से प्रहलाद बच गया और होलिका जल गई क्योंकि उसने वरदान का उपयोग बुराई के लिए किया था। इसीलिए होली का त्यौहार बुराई पर भलाई की जीत का संदेश देता है।

गायत्री ठाकुर "सक्षम" नरसिंहपुर ,मध्य प्रदेश

कवयित्री नैन्सी गुप्ता जी द्वारा विषय- ए सिपहिया कैसी रहती होली#

ए-सिपहिया कैसी रहती तेरी होली,
सुना है खेलता है जब तू ,
बंद हो जाती सबकी बोली ।
देशभक्ति के रंग में डूबकर,
खेलता है जब तू खून की होली।।

तेरी सुहागन बाट को निहारा करती,
तेरी माँ तेरे लाल का सहारा करती।
तेरा बूढ़ा बाप शान से सबको रंग-गुलाल मलता फिरता,
बस एकाकी में उसकी नजरें तुझपे पहरा डारा करती।।
हरदम कहता है मनाऊंगा तेरे संग अगली होली,
ए-सिपहिया.................
बर्फ की थपेड़ों में तू खुद को माँ की ममता से ढाक लेता,
तू दुश्मनों को दूर से ही भाप लेता ,
मार भगा देता जब उनको,
तब जाकर तू सास लेता।।
शहीद होता तू ऐसे जैसे हो जश्न-ए-होली।।
ए-सिपहिया..................

*नैन्सी की कलम*
*कवयित्री नैन्सी गुप्ता*
*सफीपुर(उन्नाव),उत्तर प्रदेश*
*सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ।_*

सुभाष चौरसिया हेम बाबू जी द्वारा विषय होली पर जीजा साली संवाद#

भाषा -- बुन्देली 
 विधा -- फाग
 # होली पर जीजा साली संवाद #
जीजा अबे  रंग न डारो
अबे रंग न डारो
अंचरा में लेंयें हों बारो
जीजा अबे  रंग न डारो
अबे रंग न डारो
अंचरा में लेयें हों बारो
थपकी दे दे तनिक सुबा देयों
फिर पलना में पौढा़ देयों
फिर कर हों तुम्हाओ मूं कारो
जीजा अबे  रंग न डारो
अबे रंग न डारो
अंचरा में लेंयें हों बारो
जीजा तनकउ न माने
बारे खां छुडा़कें पलना में पारो
जीजा को जिया मतवारो
सारी  खां रंग सारो
अंचरा में लेयों हों बारो
जीजा  रंग अबे न डारो
अबे रंग न डारो
अंचरा में लेयों हों बारो
जीजा ने भर पिचकारी मारी
सराबोर कर दई साली की सारी
तनकउ न मानो हुरयारो
अंचरा में लेयों हों बारो
जीजा अबे  रंग न डारो
अबे रंग न डारो
अंचरा में लेयों हों बारो
फिर सारी हुरयानी
कलसा में भर लाई पानी
ऊ में तूतिया रंग डारो
जीजा मूं कर दओ कारो
अंचरा में लेयों हों बारो
जीजा  रंगअबे न डारो
अबे रंग न डारो
अंचरा में लेयों हों बारो 
सारी ने पिचकारी मारी 
 जीजा  की सगली सकल बिगारी
भूल गये जीजा हुरयारो
अंचरा में लेंयें हो बारो
जीजा अबे रंग न डारो
 अबे रंग न डारो
आंचर में लेयें हो बारो
रचना कार --सुभाष चौरसिया हेम बाबू महोबा (काका जी) 
स्वरचित मौलिक सर्वाधिकार सुरक्षिसारी रंग सा

डॉ. राजेश कुमार जी द्वारा विषय'होली' पर अद्वितीय रचना#

सादर समीक्षार्थ
 विषय    -     होली 
 विधा       -      कविता


रंग लगाओ हुडदंग मचाओ
 मन हरती कोई बात सुनाओ
गिले-शिकवे सब दूर हटाओ
खेलो- कूदो सबको मनाओ..।।

झूम के तुम भी नाचो गाओ- होली है..।।

नफरत की हर दीवार हटाओ
खुशियों की एक सौगात लाओ
प्रगाढ़ सभी संबंध बनाओ
मन की व्यथाएँ सब दूर हटाओ..।।

झूम के तुम भी नाचो गाओ- होली है ..।।

अहंकार को सब दूर हटाओ
सभी को प्रेम से गले लगाओ
प्यार के रंगों में डूब जाओ
खुशियों से सबके दामन सजाओ..।।

तुम भी झूम के नाचो गाओ- होली है ..।।

सबके ही रंग- गुलाल लगाओ
हर माथे चंदन टीका लगाओ
आज तो हरफनमौला बन जाओ 
चिंताएं सारी ही भूल जाओ..।।

 तुमभी झूम के नाचो गाओ- होली है ..।।



डॉ. राजेश कुमार जैन
श्रीनगर गढ़वाल
उत्तराखंड

'होली' पर रचना#बदलाव मंच#

मनाए कैसे होली


कोरोना की मार
दिल के कोने खाली
हाय रे हाय
मनाएं कैसे होली।

हवा हुई बेरंग
होली के नहीं रंग ढंग
धूल में वायरस के कण
हाय रे हाय
लबों पर मुस्कान जाली।
मनाए कैसे होली।

चेहरे पर है मास्क
सेनीटाइज करने का
मिला है सबको टास्क
हाय रे हाय
हाथों से लगाएं कैसे लाली।
मनाए कैसे होली।

डर का साया है मंडरा रहा
आदमी आदमी से दूर जा रहा
फिर भी रंगों का त्योहार मना रहा
हाय रे हाय
कैसे करें अपनों की रखवाली।
मनाएं कैसे होली
मनाएं कैसे होली।